साहित्य दर्पण

सोच का स्वागत नई सोच से करें।

64 Posts

34 comments

Reader Blogs are not moderated, Jagran is not responsible for the views, opinions and content posted by the readers.
blogid : 19918 postid : 1227638

पौ फटते ही

Posted On 12 Aug, 2016 Junction Forum, Social Issues, कविता में

  • SocialTwist Tell-a-Friend

पौ फटते ही पंछीसुर में राग सुनाते है,
खेत खलियानो से खुशबू मंद2 आती है!!
बीगी 2 खुसबू की दस्तक मन को हरसाते है!!
गाँव की छबी मनोरम मन को मोहते है!!
हर घर आगन में तुलसी औषधि की याद दिलाती है!!
पंचायत का लगता जमघट भेदभाव भूलजाते है!!
संस्कृति की कल्पनाओ का साक्षातकार रूब रूह देखते है!
धोती कुर्ता सिर पर पंगढी और पाव में जूता देखते है!!
सिर पर पल्लू साडीं में लजाती बलायें लाजबंती देखते है!!
मिट्टी में धमाचौकडी करते बच्चे खूब हरसाते है!!
पेङो से लहराती हवा और कोपले पीयु2 धुन सुनाते है!!
कड कड से आती हे सुंगन्ध छाप हृदय में बस जाती है!!
दूध दही छाँच की सरिता घर आगन बहती जाती है!!
आ जाये कोई शहरी बाबु तो दामाद शी खातिर पाते है!!
मातम हो या खुशिया भाईचारा हर बिधि को मिल वाँटते है!!
सध्या बाती की आवाज भी मिठास रस घोलती है!!
खुले आकाश में सोना तारों से बतलाना चाँद को देखते है!!
दादी नानी से किस्से कहाणी सबको खूब भाते है!!
गाँव के बिना भारत की किलकारी अधूरी है!!
खेत खलियान के बिना जीवन का आधार अधूरा है!!
किसान तेरे बिना हर प्राणी ही अधूरा है!!
तुझे करू बंदना बार बार तुझ बिन सब हे सूना सूना,,,,,,!!
(आकाँक्षा जादौन)



Tags:   

Rate this Article:

1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (No Ratings Yet)
Loading ... Loading ...

0 प्रतिक्रिया

  • SocialTwist Tell-a-Friend

Post a Comment

CAPTCHA Image
*

Reset

नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments


topic of the week



latest from jagran