साहित्य दर्पण

सोच का स्वागत नई सोच से करें।

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akankshajadon1


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कृषक का जीवन

Posted On: 8 Nov, 2014  
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कविता में

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मादक का पुजारी

Posted On: 30 Oct, 2014  
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गरीब आखिर गरीब क्यो

Posted On: 28 Oct, 2014  
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Hello world!

Posted On: 27 Oct, 2014  
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में

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

आकांक्षा जी, बहुत अच्छे विचार और बहुत अच्छी भावनाए है आपकी, ये सही बात है कि कोई अपने ही बच्चों की कुर्बानी से खुश कैसे हो सकता है, और फिर दुसरे के जीवन का अंत करना कुर्बानी कैसे हो सकती है पर कमियां सिर्फ यहीं नहीं है, तमाम मंदिरों में भी मुझे कष्ट होता है जब मैं ये देखता हूँ की प्रतिदिन बकरे की बलि चढ़ती है देवी माँ को खुश करने के लिए, हमें उसका भी विरोध करना चाहिए, पर ये अच्छा है की आपने उन नीरीह बेजुबानो की तरफदारी की, मुझे जानवरों से बेइंतहा लगाव है और मैं उनके पक्ष में लिखा लेख कहीं भी मिलता है तो जरूर पढता हूँ। आपसे विनम्र निवेदन है की कल, २७ सितम्बर को विश्व पर्यटन दिवस के अवसर पर जरूर पढ़ें - हिंदुस्तान का सबसे ख़ूबसूरत गुमनाम जिला - निश्चय ही आपको अच्छा लगेगा, ये मेरी १० साल की मेहनत है धन्यवाद दीपक कपूर www.superawakening.com

के द्वारा: Deepak Kapoor Deepak Kapoor

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के द्वारा: deepak pande deepak pande

महोदय जी में आपकी बात समर्थन करती हूँ पर नादान बच्चो आये दिन मानसिक पर घात हो रहे जो कल का भविष्य थे उनकी निदर्यी हत्या कर दी गई अभी हाल में ही नरकंकाल की घटना ने जख्म हरे कर दिये हे ,तब मुझे ऐसा लगता हे ऐसे व्यक्ति कंश जैसे पृवति के हे ये बदल नहीं सकते बल्कि और गुनाह गार को पोत्साहित कर रहे हे ये लोग यही सोचेगे कि मगरमच्छ के आसू दिखाकर सजा से बच जायेगे।जो सच में बदलना चाहता हे पृश्चित करते हे वो सजा से बचते नहीं हे बल्कि उसका स्वागत करते जितना भी समय मिलता हे उसमें सच के पथ पर चलकर लोगो को सोचने के लिए मजबूर कर देते हे।पर मुझे नहीं लगता ये बुद्ध बन सकता हे बुद्ध वही बन सकता हे जिसके हृदय में सच में पृश्चित हो पर देखते हे ।

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